असंगजनन Apomixis in hindi

असंगजनन  के प्रकार व महत्व

आवृतबीजी पादपों में लैगिंक जनन हेतु किसी पादप में सर्वप्रथम अर्द्धसूत्री विभाजन होता है जिसकी फलस्वरूप नर व मादा अगुणित युग्मक बनते हैं । तत्पश्चात इनमें युग्मकों का संयुग्मन ( fusion ) होता है जिससे द्विगुणित पादपों का निर्माण होता है । द्विगुणित पादप दीर्घजीवी , स्वयंपोषी तथा जड़ , तने व पत्तियों में विभक्त रहता है जबकि इसकी अगुणित पीढ़ी हासित अल्पजीवी व कुछ कोशिकाओं के समह तक ही सीमित होती है । इन दोनों पीढ़ियों में सामान्यतः एकान्तरण चलता रहता है जो पीढ़ी एकान्तरण ( altermation of generation ) कहलाता है ।

अनेक बार देखा गया है कि लैंगिक जनन अलैंगिक प्रक्रिया द्वारा स्थानापन्न ( substitute ) हो जाता है जिसके अन्तर्गत अर्धसत्रण तो सम्पन्न होता है परन्तु युग्मक संलयन ( syngamy ) नही हो पाता ( सामान्य रूप से हाने वाला केन्द्रकों का संयग्मन ) । इस प्रकार से निर्मित पादप असंगजनिक पौधे कहलाते हैं व यह प्रक्रिया असंगजनन ( एपो – बिना : मिक्स – मिश्रण ) कहलाती है ।

परिभाषा

लैगिंक जनन का अलैगिंक प्रक्रिया द्वारा प्रतिस्थापन ( substitution ) असंगजनन ( apomixis ) कहलाता है तथा विकलर ( Winkler 1908 ) के मतानुसार लैंगिक जनन का किसी भी ऐसी विधि द्वारा प्रतिस्थापन , जिसमें अर्धसूत्री ( meiotic ) विभाजन तथा युग्मक संलयन नहीं पाये जाते हैं वह विधि असंगजनन कहलाती है ।

एपोमिक्सिस के प्रकार:

माहेश्वरी (1950) ने निम्न तीन प्रकार के एपोमिक्स को मान्यता दी:

(1) Non-recurrent apomixis :

इसके अन्तर्गत गुरु बीजाणु मातृ कोशिका अर्द्धसूत्रण द्वारा अगुणित भ्रूण कोष ( embryo sac ) का निर्माण करती है । इसमें निषेचन नहीं होता परन्तु अण्ड कोशिका सीधे ही भ्रूण का निर्माण करती है । इस विधि को . ( hapliod parthenogenesis ) कहते हैं ।

इसके अलावा मादा युग्मकोद्भिद की किसी अन्य कोशिका से भी भ्रूण ( embryo ) बन सकता है । इसमें में भी निषेचन नहीं होता व अतः इसे अगुणित अपयुग्मता ( halploid apogamy ) कहते हैं । इन पादपों में मात्र एकल गुणसूत्र सेट उपस्थित होता है अतः यह बन्ध्य ( sterile ) होते हैं व यह प्रजनन अक्षम होते हैं । सोलेनम नाइग्रम में जोर्गनसन ( Jorgensen ) ने 1928 में अगुणित असंगजनन रिपोर्ट किया हालांकि परन्तु यह प्रकृति में कम मिलता है।

  • हैप्लोइड पार्थेनोजेनेसिस– यह एक unfertilized अंडे से भ्रूण का विकास है। जॉर्गेनसेन (1928) ने बताया कि सोलेनम की कुछ प्रजातियों में अगुणित पार्थेनोजेनेसिस को प्रेरित किया जा सकता है लेकिन दूसरी प्रजातियों के पराग के साथ अंडे को निषेचित नहीं किया जाता है। उन्होंने देखा कि जब एस ल्यूटियम का परागण से सोलनम नाइग्रम की स्टिग्मा से किया, तो नर नाभिक अंडे में चला गया लेकिन कोई प्रभावी केन्द्रक संलयन नहीं था और नर नाभिक जल्द ही बिखरने लगा। हालांकि, अंडे को सक्रिय किया गया था जैसे कि सामान्य निषेचन और एक भ्रूण का गठन किया गया था।

ऑर्किस मैकुलता, एपिपैक्टस लैटिफोलिया और प्लेटिनथेरा क्लोरेंटा जैसे पौधों में,पराग नली प्रवेश करती है,  निषेचन के बाद डिंब और अंडाणु द्विगुणित भ्रूण में विकसित हो जाते हैं, लेकिन कभी-कभी पराग नली डिंब में प्रवेश नहीं करती है या एक समय में प्रवेश करती है जब निषेचन में बहुत देर हो जाती है। पराग नलिका भ्रूण सेक में प्रवेश न करने की स्थिति में, अंडा निषेचन के बिना अगुणित भ्रूण बनाने के लिए विभाजित होता है। माहेश्वरी (1950) के अनुसार अंडाणु निम्न कारणों से निषेचित होने में विफल हो सकते हैं:

  1. गैर-क्रियाशील पराग नली।
  2.  ट्यूब की डिस्चार्ज करने में असमर्थता।
  3. नर और मादा केन्द्रक के बीच अपर्याप्त आकर्षण।
  4. शुक्राणुओं का जल्दी पतन।
  5. अंडे की परिपक्वता और नर युग्मकों का प्रवेश समकालिक न हो पाना।

हैप्लोइड पार्थेनोजेनेसिस की घटना पौधे के प्रजनन और आनुवांशिकी में काफी महत्व हो सकती है। इस प्रक्रिया में निषेचन सही प्रजनन प्राप्त करने में सक्षम होता है जो केवल होमोजायगस रूपों को प्राप्त करता है।

  • हाप्लोइड अपोगामी- यह अंडे के अलावा भ्रूण सेक के किसी भी सेल से भ्रूण का विकास है। लिलियम मार्टागन, बर्जेनिया डेलवाई और एरिथ्रेया सेंटोरियम में ट्विन प्रोएम्ब्रियोस देखे गए हैं। इनमें से एक भ्रूण सामान्य निषेचन द्वारा अंडे से विकसित होता है और दूसरा एक उत्तेजित हैप्लोइड सिनर्जिड सेल से। दो भ्रूणों का प्रारंभिक विकास निकट तुलनात्मक है, लेकिन सिनर्जिड भ्रूण, जो अगुणित है, जल्द ही पतित हो जाता है।

(2) Recurrent apomixis :

इसके अन्तर्गत भ्रूणकोष प्रप्रसूतक ( archerporial ) अथवा बीजांडकाय ( nucellus ) की कोशिकाओं से विकसित हो सकता है । प्रप्रसूतक से भ्रूणकोष का बनना जननअपबीजाणुता ( generative apospory ) तथा बीजांडकाय से भ्रूणकोष का विकसित होना कायिक अपबीजाणुता ( somatic apospory ) कहलाती है । इसमें भ्रूणकोष के सभी केन्द्रक द्विगुणित होते है । गुणसूत्रों की संख्या में अर्धसूत्रण नहीं होता है । भ्रूण कोष की अण्डकोशिका से निषेचन की अनुपस्थिति भ्रूण का निर्माण द्विगुणित असंगजनन ( diploid parthenogenesis ) कहलाता है परन्तु जब कोई अन्य कोशिका द्वारा भ्रूण का निर्माण होता है तब वह द्विगुणित अपयुग्मता ( diploid apogamy ) कहलाती है।

  • जनरेटिव एपॉस्पोरी – यह आर्किस्पोरियम की द्विगुणित कोशिकाओं से द्विगुणित भ्रूण का विकास है। पार्थेनियम अर्जेण्टेटम, जिसकी दो किस्में हैं, जेनरेटिक एपोपोरी का सामान्य उदाहरण है। किस्में (2n = 36) में से एक मेगास्पोर मदर कोशिका सामान्य मेयोटिक विभाजन से गुजरती है और अंततः मादा गैमेटोफाइट बनाती है। सिन्गैमी और डबल निषेचन के बाद भ्रूण और एंडोस्पर्म का समन्वित विकास होता है। दूसरी ओर, दूसरी किस्म (2n = 72) में, मेगास्पोर मदर सेल का केंद्रक अर्धसूत्रीविभाजन से गुजरता है, लेकिन dyad या बीजाणु टेट्राड को जन्म नहीं देता है, और इसके बजाय यह बढ़ जाता है और स्वयं भ्रूण सेक की तरह कार्य करता है।
  • सोमेटिक एपोस्पोरी – एंजियोस्पर्मों में एपोस्पोरी पहली बार रोसेनबर्ग (1907) द्वारा Hieracium प्रजातियों में बताई गई थी, यहाँ मेगास्पोर मदर सेल सामान्य अर्धसूत्री विभाजन से गुजरती है और टेट्राड बनाती है। इस स्तर पर एक बीजाण्डीय कोशिका सक्रिय हो जाती है और एक भ्रूण सेक विकसित करने लगती है। मेगास्पोर धीरे-धीरे पतित होते हैं और एपोस्पोरिक भ्रूण सेक परिपक्व होते हैं। बीजाड या अध्यावरण की कोशिका से द्विगुणित भ्रूण सेक के विकास को सोमेटिक एपोस्पोरी के रूप में जाना जाता है। Hieracium सोमेटिक एपोस्पोरी का सबसे सामन्य उदाहरण है।

(3) Adventive embryony :

इसमें भ्रूण , भ्रूणकोष के बाहर उपस्थित द्विगुणित आवरणों ( integuments ) या बीजांडकाय की कोशिकाओं से विकसित होता है। इस प्रक्रिया में मातृ बीजाणुद्भिद जनक ( parent sporophyte ) से सीधे ही द्विगुणित भ्रूण निर्मित होता है अतः इनमें पीढ़ियों का एकान्तरण नहीं पाया जाता है अपस्थानिक भ्रणीयता से उत्पन्न पादप का आनुवांशिक संगठन ( genetic constitution ) जनक पादप के समान ही पाया जाता है । यह सिट्रस , एलियम , यूफोर्बिया इत्यादि में पाया जाता है ।

बीजाण्ड या अध्यावरण की कोशिकाएं, अपस्थानिक भ्रूण का निर्माण करती हैं, घनी प्रोटोप्लास्मिक बन जाती हैं और मेरिस्टेमेटिक कोशिकाओं के एक छोटे द्रव्यमान को बनाने के लिए सक्रिय रूप से विभाजित होती हैं। यह ऊतक द्रव्यमान सक्रिय रूप से बढ़ता है, इसे भ्रूण सेक में धकेलता है और अंततः भ्रूण प्रतीत होता है। जायगोटिक के साथ-साथ एक ही भ्रूण सेक में एक साथ अपस्थानिक भ्रूण का विकास हो सकता है। सामान्य (जाइगोटिक) भ्रूण में एक सस्पेंसर होता है, जबकि nucellar अपस्थानिक भ्रूण में सस्पेन्सर अनुपस्थित होता है। सिट्रस, अपस्थानिक भ्रूण का सबसे आम उदाहरण है। सिट्रस के एक ही बीज में दस व्यवहार्य भ्रूण पाए जा सकते हैं। यूफोरबिएसी, कैक्टैसी बक्सैसी और ऑर्किडेसिए के सदस्यों में भी अपस्थानिक भ्रूणता की उपस्थिति सामान्य है।

एपोमिक्सिस का महत्व :

  1.  वे पौधे जहां आमतौर पर लैंगिक प्रजनन को एक प्रकार के अलैंगिक प्रजनन द्वारा पूरी तरह से बदल दिया जाता है, को एपोमिटिक कहा जाता है, और घटना को एपोमिक्स के रूप में जाना जाता है। चूंकि एपोमिक्सिस में अर्धसूत्रीविभाजन शामिल नहीं है, यहाँ गुणसूत्रों का अलगाव और पुनर्संयोजन नहीं है। अप्रभावी जीनों द्वारा एपोमिक्स का नियन्त्रण।
  2. एपोमिक्सिस अलगाव या पुनर्संयोजन के कारण किसी भी बदलाव के बिना विशेष रूप से अनुकूल जीवों के अनिश्चित गुणन की संभावना प्रदान करता है।
  3. इस प्रकार यह अनिश्चित काल के लिए वांछनीय लक्षणों को संरक्षित करने में उपयोगी है। लेकिन- विकास और भिन्नता में अर्धसूत्रीविभाजन के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।
  4. अप्रभावी एपोमिक्टिक प्रजातियों में हालांकि वांछनीय पात्रों को काफी लंबे समय तक संरक्षित किया जाता है, वे विकास से वंचित हैं।
  5. इसके विपरीत, faculative  एपोमिक्टिक प्रजातियों में, लैंगिक और अलैंगिक प्रक्रियाएं एक साथ होती हैं और इसलिए एपोमिक्सिस का बहुत महत्व है।
  6. हालांकि, faculative एपोमिक्टिक या पौधों के समूह में जहां लैंगिक और एपोमिक्टिक सदस्य सह-अस्तित्व में हैं, इस घटना का विशेष महत्व है।
  7. अगुणित असंगजनन द्वारा सत्य समजात प्रकार (homozygous types) के पादप प्राप्त होते हैं जो आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं ।
  8. कृत्रिम विधि व जैसे X – ray , उच्च व निम्न तापक्रम द्वारा परागण को अवरूद्ध करके इन्हें प्राप्त किया जा सकता है ।

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