प्रतिजन प्रतिरक्षी क्रिया Antigen Antibody reaction in hindi

प्रतिजन प्रतिरक्षी क्रिया ( Antigen Antibody reaction )

प्रतिजन एवं प्रतिरक्षी एक दूसरे के साथ विशिष्टता के साथ संलग्न होते हैं इनके मध्य होने वाली क्रिया का प्रेक्षण सम्भव है । ये क्रियाएँ द्विदिशीय प्रकार की होती हैं । ये क्रियाएँ एन्टीजन के निर्धारक स्थल केएपीटोप ( epitope ) व एन्टीबॉडी के परिवर्तनशील क्षेत्र या स्थल पेराटोप ( paratope ) के मध्य होती हैं । इन क्रियाओं में हाइड्रोजन बन्ध , आयनिक बन्ध , जल विरागी अन्तः क्रियाएँ तथा वान्डरवाल अन्त : क्रियाएँ भाग लेती हैं । ये सभी क्रियाएँ एक लघुकाल में सम्पन्न होती हैं तथा एन्टीजन – एन्टीबॉडी के मध्य हुए दृढ़ संयोजन पर निर्भर करती हैं । ये क्रियाएँ जाति विशिष्टता रखती हैं । एन्टीजन एन्टीबॉडी क्रियाएं तीन पदों में सम्पन्न होती हैं ।

प्रथम पद के अन्तर्गत दोनों के मध्य अन्योन्य क्रिया ( interaction ) होती है । यह क्रिया तीव्र गति से निम्न ताप पर भी सम्भव है । इसमें भौतिक रसायन व ऊष्मागतिकी के नियमों का पालन किया जाता है । यह क्रिया उत्क्रमणीय ( reversible ) होती है । इन दोनों के अणुओं के मध्य आयनिक बन्ध , हाइड्रोजन बन्ध , वानडर वाल बल द्वारा दुर्बल बन्ध बनते हैं । यह

क्रिया दिखाई नहीं देती किन्तु भौतिक , रासायनिक , रेडिओधर्मी आइसोटॉप्स या प्रतिदीप्तिशील रंजक ( fluorescent dyes ) के द्वारा जाँची जाती हैं । इसके बाद द्वितीय पद आरम्भ होता है किन्तु यह आवश्यक नहीं है कि सभी एन्टीजन – एन्टीबॉडी क्रियाओं में यह दिखाई दे । यह पद अवक्षेपण , समूहन , कोशिका लयन , जीवित प्रतिजनों का नष्ट होना , चलनशील जीवों का उदासीकरण ( neutralisation ) एवं भक्षाणुषण ( phagocytosis ) की आरम्भिक तैयारी होना जैसी क्रियाओं के रूप में सम्पन्न होता है । तृतीय पद श्रृंखला बद्ध क्रियाओं के रूप में आरम्भ होती है । इसके अन्तर्गत हानिकारक एन्टीजन्स का उदासीकरण या नष्ट किया जाना अथवा उत्तक नष्ट किये जाने जैसी क्रियाएँ होती हैं । विभिन्न रोगाणुओं के प्रति एवं एलर्जिक पदार्थों के प्रति की जाने वाली तरल रोधकक्षमता की क्रियाएँ भी इसके अन्तर्गत सम्मिलित की जाती हैं ।

एन्टीजन एन्टीबॉडी अभिक्रियाओं को अध्ययन की दृष्टि से निम्न क्रियाओं वर्गीकृत किया जाता है –

  1. अवक्षेपण ( Precipitation )
  2. समूहन ( Agglutination )
  3. उदासीकरण ( Neutralization ) – कुछ विशिष्ट एन्टीबॉडीज उदासीकारक एन्टीबॉडीज कहलाती है जो विशिष्ट एन्टीजन्स जैसे वाइरस केप्सिड्स से क्रिया करती हैं एवं विषाणओं को पोषक को कोशिकाओं पर संलग्न नहीं होने देती । इन्फ्लुएन्जा का विषाणु न्युटाएमीनेडेस एन्टीबॉडीज द्वारा रोका जाता है । उदासीकारक एन्टीबॉडीज विषाणुओं का समूहन कर भक्षाणुनाशन क्रिया को प्रभावी बनाती हैं । ये आविष पदार्थो को निष्क्रिय करने का कार्य भी करती है । इस प्रकार की विशिष्ट एन्टीबॉडीज एन्टीटॉक्सिन ( antitoxin ) कहलाती हैं जो आविष ( toxins ) की प्रकृति में परिवर्तन ला देती है ।
  4. आप्सिनेशन ( Opsination ) – कुछ एन्टीबॉडीज जिन्हें आप्सोनिन्स ( onsonins ) कहते हैं भक्षाणुनशन क्रिया को उद्दीप्त करती हैं । ये इस क्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । एन्टीबॉडीज के fab खण्ड पर एन्टीजन के संलग्न होने के तुरन्त बाद fc खण्ड फेगोसाइट में प्रवेश कर जाता है इसके लिये फेगोसाइट पर एक ग्राही स्थल होता है ।
  5. पूरक तन्त्र ( Complement system ) – मानव सीरम में कारकों का विशिष्ट तन्त्र पाया जाता है । यह तन्त्र एन्टीबॉडी क्रियाओं द्वारा सक्रिय होकर अनेक जैविक कार्यों का निष्पादन करता है । बोर्डे एवं जेन्ग्य ( Bodet and Gengou ) ने 1901 में पूरक स्थिरीकरण परीक्षण ( complement fixation test ) की खोज की जिसमें रक्त के मिलाने पर संवेदी सीरमीय क्रिया होती है । इस परीक्षण का व्यापक उपयोग है सिफलिस रोग का परीक्षण इसी के द्वारा किया जाता है । पूरक ( complement ) एक अकेला पदार्थ नहीं है बल्कि यह नौ ( 9 ) प्रकार के प्रोटीन के अंशों से बना जटिल है । इन्हें C₁ से C₂ , तक तक नाम दिये हैं ।
  6. भक्षाणुनाशन ( Phagovytosis ) 

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